धनदेवता भगवान कुबेर

भगवान कुबेर की कृपा, साधना, मंत्र, राजयोगी मणिलाल छेडा के अनुभव और स्वतंत्र कुबेर मंदिर के संकल्प की page-wise जानकारी.

॥ आनंदी आनंद ॥
॥ धनदेवता कुबेर ॥

सम्माननीय महोदय, आप का हर दिन आपके लिये सौभाग्य तथा शुभ लाभ का हो यही हमारी धनदेवता भगवान कुबेर के चरणों में प्रार्थना है। आप का हर सपना पूरा हो और जीवन में सफलता तथा ऐश्वर्य प्राप्त हो, आपके मार्ग में आनेवाली समस्याएँ संकट, विरोध दूर हो, इस लिये भगवान कुबेर की कृपादृष्टि आप पर सदैव रहे, यही हमारी शुभकामना है।

भगवान कुबेरजी पर हमारी अपार श्रद्धा है। भगवान कुबेरजी के आशीर्वाद से हमारे जीवन में जो बदलाव, कांती हुई उस से प्रेरणा लेकर खुद ‘कुबेर’ होकर, दुसरों को ‘कुबेर’ करने का आदर्श लेकर भगवान खुद कुबेर कार्य में आजीवन समर्पित कर दिया। भगवान कुबेर धनप्राप्ति, धनवृद्धि और धन संचय के देवता है।

उनका जीवन और सहचर्य, कृपादृष्टि और कृपापात्र सब को मिले और उनका तन मन जीवन भगवान कुबेर द्वारा प्राप्त धन और ऐश्वर्य से धन्य हो इस हेतु हम कृतसंकल्प है। भगवान कुबेर की धर्मशास्त्र द्वारा सिद्ध की हुई प्रतिमा कार्यालय तथा घर में ऐसे स्थानपर स्थापित की जाती है जहाँ आने-जाने वाले हर व्यक्ति को आसानी से दृष्टि मिलेगी। इस प्रतिमा को किसी भी दिशा में स्थापित किया जा सकता है। दक्षिण दिशा छोड़कर।

सभी का कल्याण हो, भला हो ऐसी इच्छा आप करते हैं। आप सभी लोगों की यथाशक्ति सहायता करते हैं। मदद करने की इच्छा के साथ-साथ मदद करने की क्षमता का होना जरूरी है। आपकी प्रगति, सभी की उन्नति एवं परिवार के सम्पन्न होने के लिये एकमात्र साधन है धन, और धनका होना अति आवश्यक है।

धनदेवता भगवान कुबेरजी धन दाता हैं। भगवान कुबेरजी आपके साथ होंगे, तो लोगों का कल्याण करने की इच्छा और आर्थिक क्षमता बढ़ेगी। हमारे लिये भगवान कुबेरजी ईश्वर का साक्षात रूप हैं, जिनके साथ हम एकरूप होने का अनुभव करते हैं।

एक अद्भुत घटना के बाद, पिछले कई सालों से मैं भगवान कुबेर की पूजा, प्रार्थना, आराधना, उपासना, श्रद्धापूर्वक कर रहा हूँ। मेरे जीवन में कई घटनाएँ घटी। जैसे के मैं सातवीं कक्षा से आगे पढ़ने की इच्छा होते हुए भी गरीबी परिस्थिति के कारण पढ़ नहीं पाया। दिनरात मोल मजदूरी करके हर एक प्रसंग का अनुभव लेते हुए आर्थिक, शारीरिक, मानसिक कई उतार-चढ़ाव देखते अपने आप से सहमा हुआ रहा।

॥ ॐ ह्रीं ॐ निंम ह्रीं निंम
क्लिम ह्रीं क्लिम वित्तेश्वराय नमः ॥

मेरे जीवन में एक समय ऐसा था की ऐसी मजदूरी करने के लिये मैं पैदा नहीं हुआ हूँ ये मैं समझ रहा था। लेकिन पहली छूट नहीं रही थी, कष्टोंको मुक्ति का मार्ग नहीं मिल रहा था। मेरे मन में हिम्मत थी, लेकिन साथ में हमारी हिम्मत की कोई कीमत नहीं थी।

अंधेरे में सपने देखता था, लेकिन उनको साकार करने का दिन नहीं उग रहा था। ‘मुझे मालिक बनना है, नौकर बन के नहीं रहना’ ये मैंने ठान लिया था, लेकिन मेरे प्रयासों को कर्मों का साथ नहीं मिल रहा था, सफलता नहीं मिल रही थी।

अंधेरे ऐसे प्रयासों और प्रयासों के बीच वो अद्भुत घटना घटी। मैं त्र्यंबकेश्वर तो भगवान शिवजी के दर्शन करने गया था। आज तक केवल श्रद्धा के आधार पर सभी कठिनाइयों का सामना किया था, सबकुछ सह लिया था और उम्मीद कायम रही थी। त्र्यंबकेश्वर तो भगवान शिवजी का साक्षात जागृत स्थान है।

परिस्थिति से स्थिति मनस्थिति में हम अंधेरे में एक चबुतरे पर आँसू बहाते बैठे थे। अंधेरे में, आसमान में कब घने बादल छा गये अटकती पता नहीं चला। आसमान में चमकती हुई बिजली, कहीं दीपक गिर रही थी। बीच बीच में बिजली कड़कों को बहरा करने वाली आवाज करती हुई कहीं पर गिर रही थी ये महसूस हो रहा था।

धुंधाधार बारिश ने बिजली की चमकती हुई रोशनी हुई और उस रोशनी में, ऐसा लगा की, भगवा वस्त्र पहना हुआ कोई संन्यासी हमारी तरफ चलते हुए आ रहा था। फिर बादलों की गड़गड़ाहट हुई और बिजली चमक उठी, अब वो संन्यासी बिल्कुल हमारे नजदीक आ गया था।

संन्यासी महाराज ने हमारे हाथ एक ‘यंत्र’ थमा माथे-भालों जैसी कोई वस्तु, कहते हुए रोज कुबेर मंत्रजाप करो और भगवान कुबेर की प्रतिमा की पूजा करो। भगवान कुबेर अष्टलक्ष्मी कुबेरजी धनदाता भगवान हैं। वे तुम्हारे व्यवसाय में भागीदार हैं ऐसा समझकर उनके अनुसार व्यापार करो। एक दिन तुम खुद कुबेर हो जाओगे और अच्छे लोग भी तुम्हारी वजह से कुबेर जैसे धनवान होंगे।

हमने जो देखा, अनुभव किया, वो साक्षात था या भगवान कुबेर का साक्षात्कार था, ये समझ नहीं आ रहा था। लेकिन त्र्यंबकेश्वर के जागृत देवस्थान में त्र्यंबकेश्वर भगवान शिव के मित्र भगवान कुबेरजी, संन्यासी महाराज के रूप में दर्शन, दृष्टांत, गुरुतत्त्व के गये, इस में मेरे मन कोई संदेह न रहा।

॥ ॐ निंम श्री वासुपुरुषाय नमः ॥

भगवान कुबेरजी के ध्यान में जो होते हुई हम त्र्यंबकेश्वर का वर्णन कर रहे हैं वास्तव में। संन्यासी महाराजने दिये हुए मंत्र थे - मंत्र १: ॥ ॐ निंम श्री वासुपुरुषाय नमः ॥ मंत्र २: ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लिम वित्तेश्वराय नमः ॥

ये दो मंत्र मेरे लिये परम तारक के लिये सबूत है कि ये घटना सपना अथवा भ्रान्त नहीं थी, प्रत्यक्ष घटी घटना है। अभी भी वह दिवस भूलने की कोशिश करूँ तब भी भगवान कुबेर की ये साधना दर्शन दिये हैं।

कुछ ही वक्त में हमारी आर्थिक स्थिति बदलना शुरू नहीं हुई, किन्तु मानसिक स्थिति में अद्भुत परिवर्तन आया था। मन शांत था। मेरे व्यापारों को परमेश्वरी अधिष्ठान मिलने का आत्मविश्वास मिला। नये संकल्प, समृद्धि की शुरुआत होने लगी।

संसार ही और देखने का अपना नजरिया बदलने से, संसार का अपनी तरह देखने का नजरिया बदलता है, ये मैं अनुभव करने लगा। एक तरफ आर्थिक और दूसरी तरफ आध्यात्मिक साधना शुरू हुई थी। भगवान कुबेर की कृपा से योग्य सही और उसका उपयोग करने की बुद्धि मिल रही थी। फलस्वरूप व्यापार में व्यवहार यशस्वी हो रहे थे।

भगवान कुबेर की आराधना, उपासना करते करते, भगवान कुबेर के चरणों में लीन होते होते, कुबेर के स्वरूप में विलीन की अनुभूति करने लगा था। हम इंटरनेट, पुराने साहित्य, पुराण, धार्मिक यंत्र इत्यादि द्वारा, कुबेर-कथा तथा जानकारी का शोध और संग्रह कर रहे थे।

भगवान कुबेरजी की कृपापात्रता का भाग जैसे मुझे हुआ, वैसा सर्वसामान्य, शिवभक्ती, गणेशभक्ती करने वाले आज के श्रमिकोंको कैसे मिल पाएगा इस विचार से भगवान कुबेरजी के चरणों का स्मरण करते करते हमारी इच्छा धर्मसंस्था के रूप शुरू हुई।

इस संकल्पना के साथ, भगवान कुबेरजी के भक्त तथा भाविकों के लिये, अपनी सहायता-सहकार से व्यवस्थित और समृद्धिपूर्ण, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में सही उपास्य होवाले संस्था की संकल्पना अब मार्गदर्शी के साथ हो रही है। भगवान कुबेरजी की प्रतिमाएँ सभी जगह हैं किन्तु अपवाद को छोड़कर, सिर्फ भगवान कुबेरजी के स्वतंत्र मंदिर, कहीं भी नहीं है। हमारा संकल्प स्वतंत्र भगवान कुबेर मंदिर का है।

॥ ॐ ह्रीं ॐ निंम ह्रीं निंम
क्लिम ह्रीं क्लिम वित्तेश्वराय नमः ॥
परिचय - ॥ धनदेवता भगवान कुबेर ॥

वेद, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथ में, धर्मशास्त्र, पुराणों में तथा रामायण और महाभारत में भगवान कुबेरजी के अनेकांश उल्लेख हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार ही, जैन तथा बौद्ध धर्म ग्रंथों में भगवान कुबेर-अवतार स्वरूप में सम्माननीय स्थान दिखाई देते हैं।

भगवान कुबेरजी, उनके पिता विश्रवा के संबंध में ‘वैश्रवण’ नाम भी जाने जाते हैं। बौद्ध धर्मग्रंथों में भगवान कुबेरजी का उल्लेख ‘वैश्रवण’ इस नाम से ही किया है। यक्षों के राजा होने के नाते भगवान कुबेरजी को ‘यक्षराज’ या ‘यक्षाधिपति’ के नाम से गौरवित किया है।

भगवान कुबेर पर साक्षात देवताओं की कृपादृष्टि थी, उन्होंने ही भगवान कुबेर को अलकापुरी, लंका का राज्य एवं पुष्पक विमान अपने वरदान से प्रदान किया था। सौतेले भाई रावण ने जब कुकृति से कुबेर की सोने की लंका छीन ली, तब ब्रह्मदेव एवं महादेव ने विश्वकर्मा को कहकर हिमालय पर्वत पर अलकापुरी का निर्माण किया और कुबेर को प्रदान की।

साहित्य कालिदास ने मेघदूत इस काव्य में अलकापुरी का ‘स्वर्गनगरी’ ऐसा वर्णन है। भगवान कुबेरजी को देवता, उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वरदान स्वरूप दिया है। भगवान कुबेरजी, उनकी सुवर्ण कांती के फलस्वरूप अन्य देवताओं से अलग वैशिष्ट्यपूर्ण माने जाते हैं।

भगवान कुबेरजी स्वर्ग-पृथ्वी-पाताल इन तीनों लोकों के कोष तथा खजानों के अधिपति-नियंत्रक-संरक्षक माने जाते हैं। धरती के अंदर दबा हुआ गुप्त धन भगवान कुबेरजी की कृपा से प्राप्त होता है ऐसी धारणा है। मनुष्य के जीवन में पुण्य के अनुसार धन देना, कर्मानुसार धन की वृद्धि तथा क्षति करना तथा संचय करना आदि के नियंत्रक भगवान कुबेरजी हैं ऐसा पुराणग्रंथों का निष्कर्ष है।

भगवान कुबेरजी, देवाधिदेव महादेव के ‘परममित्र’ एवं ‘परमभक्त’ के रूप में विख्यात हैं। आरती के बाद एवं धार्मिक विधि की समाप्ति पर मंत्रपुष्पांजली में वैश्रवण राजाधिराज अर्थात भगवान कुबेरजी के स्तोत्र का संबंध माना जाता है।

॥ ॐ निंम श्री वासुपुरुषाय नमः ॥

वारिस हटे से तथा पृथ्वी फलक या गुम धन, पृथ्वी खनन-जमीन खेत, इनके मानी के लिये भगवान कुबेरजी की उपासना शास्त्री, पैतृक और ज्योतिषीयों में प्रतिष्ठित की है।

भगवान कुबेरजी केवल धनप्राप्ति के अधिपति नहीं, बल्कि धनका अपव्यय, व्यर्थ खर्च रोक कर बचत करने की संजीव और मजबूती देनेवाले देवता हैं। रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा ये भगवान कुबेर के सौतेले भाई-बहन हैं।

सौतेली माँ कैकसी के उकसावे पर ही रावण ने भगवान कुबेरजी के सुवर्ण लंका पर आक्रमण किया और राज्य के साथ पुष्पक विमान का भी अपहरण किया। भगवान कुबेरजी नीति प्रिय एवं न्यायी राजकर्ता थे, व चाहते थे की उनके कारण लंका के नागरिकों का विनाश न हो, इस लिये उन्होंने देशांत कर के, उनके आराध्य देवता महादेवजी के हिमालय में आश्रय लिया।

यक्षराज कुबेरजी को देवताके खजानों और उत्तर दिशा के दिक्पाल बनाया। भगवान कुबेरजी की प्रतिमा, उनकी कृपादृष्टि सदैव बनी रहे ऐसी जगह अथवा जिस जगह आर्थिक व्यवहार होते हैं, उस जगह होनी चाहिये ऐसा धर्मशास्त्र कहता है। हर दिन की दैनंदिन कार्यों की अथवा आर्थिक व्यवहार की शुरुआत करते समय, भगवान कुबेरजी के प्रतिमा का उपास्यरूप वंदन करना चाहिये ऐसा संकेत है।

भगवान कुबेरजी ने पवनपुत्र हनुमानजी को दुर्गी शक्तियों का विनाश करने के लिये ‘सुवर्णगदा’ वरदान स्वरूप दी। सोना तैयार करने के तथा सोना देनेवालों से सोना प्राप्त करने के शास्त्र और कला के जनक भगवान कुबेरजी माने जाते हैं।

पुराणों में ऐसा बताया है कि भगवान कुबेरजी का निवासस्थान वटवृक्ष है तथा भगवान शिवजी को प्रिय बिल्ववृक्ष और नीम के पत्ते उन्हें भी प्रिय हैं। धनत्रयोदशी को भगवान कुबेरजी की पूजा करने की प्रथा, परम्परा सहस्रवर्षों से चली आ रही है। कुबेर यंत्र की रचना साक्षात श्री शिवजी ने की और श्री गणेशजी की आराधना करने के बाद कुबेरमंत्र का जाप करें, ऐसा संकेत दिया।

॥ ॐ ह्रीं ॐ निंम ह्रीं निंम
क्लिम ह्रीं क्लिम वित्तेश्वराय नमः ॥

धनत्रयोदशी के दिन लक्ष्मीजी के साथ कुबेरजी की पूजा की जाती हैं। लक्ष्मी सर्वार्थ से भाग्यदेवता हैं तो धनदेवता भगवान कुबेरजी हैं। भगवान कुबेरजी स्थायी और निरंतर धन के अधिष्ठाता हैं, इसलिये उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती हैं। लक्ष्मीजी की पूजा कुबेरजी की पूजा के साथ की जाती हैं।

भारतीय धर्मशास्त्र में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ऐसे चार पुरुषार्थ बताये गये हैं। उनमें से काम और अर्थ पुरुषार्थ के स्वामी भगवान कुबेरजी हैं। पृथ्वीपर जितनी भी खनिज संपत्ति हैं, उसके एकमात्र मालिक भगवान कुबेरजी माने जाने के कारणवश, खदानों के कार्यालयों में कुबेरप्रतिमा रखी जाती हैं। इतना ही नहीं तो कुबेरपूजन से खदानों के कार्य का शुभारंभ किया जाता हैं।

विश्वकर्माओं को जो प्रिय, वे उनके मित्र कुबेरजी को भी प्रिय होने के कारण कई भक्त कुबेर मंत्र का जाप बेल वृक्ष के तले करते हैं। विश्वकर्माओं ने कर्ण के लिये कवच कुंडल, भगवान विष्णुजी के लिये सुदर्शन चक्र, शिवशंकरजी के लिये त्रिशूल, यम के लिये दण्डकण्ड और कुबेरजी के लिये पुष्पक विमान और उसके पहले लंका और बाद में अलकापुरी का निर्माण किया।

ऐसी ही अनेक रक्षक देवता भगवान कुबेरजी के राज्य में यक्षसंस्कृति थी, जो प्रत्यक्ष में कला संस्कृति थी। सभी कलाएँ उनके राज्य में फली, फूली थीं। सभी प्रकार के ऐहिक सुख, वैभव, ऐश्वर्य का आनंद यक्षसंस्कृति में लिया जाता था। देवों के स्वर्ग में प्रिय सुरापान, देवसंस्कृति भी उतनी ही लोकप्रिय थी।

जीवन के सब सुखों का आनंद लेना, ये यक्षसंस्कृति में जीवन का महत्वपूर्ण सुख था, इस लिये भगवान कुबेरजी के सैकड़ों मूर्तियों और प्रतिमाओं में धनराशि के साथ साथ मद्य के प्याले दिखाई देते हैं। बालीता मंदिर के पास, माणा गाँव के यक्ष मंदिर वास्तु ये जो पूजनीय प्रतिमाएँ यहाँ हैं, वो भगवान कुबेरजी का अवतार माना जाता हैं।

प्राचीन काल में ऋषियों ने अपने आश्रम में कुबेर यंत्र का पूजन करते थे, ऐसी जानकारी हैं। भगवान कुबेरजी के प्रतिमा में, उनके चरणों के पास उनका प्यारा नेवला ‘मुंगूस’ और हाथ में ‘नेवली’ मतलब मुंगूस के आकार की धन की थैली जरूर दिखाई देती हैं। मुंगूस भगवान कुबेरजी को प्यारा होने के कारणही, मुंगूस के मुखदर्शन से धनलाभ होते हैं ऐसी धारणा प्रचलित हैं।

भगवान कुबेरजी का नाम गूढ़धन के साथ जुड़ा जाता हैं, इसी लिये उनको ‘गुह्याधिपति’ ऐसा भी संबोधित किया जाता हैं। भगवान कुबेरजी के लंका के और अलकापुरी के भव्य, विलासी, विविधतासे भरपूर उद्यानों का वर्णन, उनके रसिकता की साक्षी देते हैं। उनका चैत्ररथ उद्यान अलकापुरी में था। उसका सौंदर्य वर्णन महाकवि कालिदास ने मेघदूत में किया हैं।

प्राचीन संस्कृत साहित्य में भगवान कुबेरजी ऐश्वर्य और विलास के प्रतीक दर्शाये गये हैं। भगवान कुबेरजी, उत्तर दिशा के दिक्पाल होने के वजह, उत्तर दिशा को ‘कौबेरी’ ऐसा सम्बोधित किया जाता हैं। प्राचीन राष्ट्रशास्त्रों, जैसे कौटिल्य बताता हैं की, हर गाँव में जैसे प्रमुख देवताओं के मंदिर होते हैं, वैसेही भगवान कुबेरजी का मंदिर हर गाँव में होना जरूरी हैं।

प्राचीन और ऐतिहासिक काल में मथुरा, पद्मावती, विदिशा, पाटलिपुत्र ये स्थल कुबेर पूजा के लिये प्रसिद्ध धार्मिक स्थल थे। यहाँ के पूजनीय प्रतिमाओं में, एक हाथ में मदिरापात्र और दूसरे हाथ में धन का बटवा नकुली हैं। भगवान कुबेरजी और लक्ष्मीमाता का रिश्ता सभी धार्मिक ग्रंथों में दिखाई देता हैं। कुबेर पत्नी का नाम कुछ ग्रंथों में हारिती ऐसा हैं। निधि याने धन जो आठ प्रकार का माना जाता हैं, इन अष्टनिधि के स्वामी भगवान कुबेरजी माने जाते हैं।

॥ ॐ ह्रीं ॐ निंम ह्रीं निंम
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इन अष्टनिधि में से कई निधियों के प्रतीक उनके प्रतिमाओं में दर्शाये जाते हैं। बौद्ध धर्मग्रंथों में कुबेरजी को ‘जंभाल’ ऐसी संज्ञा हैं। जैन धर्म में कुबेरजी को ‘मणिभद्र’ तीर्थंकर के यक्ष का स्थान हैं।

यक्षमाला, कुबेरलक्ष्मी, कुबेरपुरी, प्राणदायिनी, वायुपुर, अलकानगरी ऐसे विविध नामों से अलकानंदा नदी पर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित कुबेरपुरी के बारे में जानकारी का संग्रह पाया जाता हैं। भगवान कुबेरजी का वाहन पुराणों के अनुसार कोई एक नहीं बताते और उनके साथी हाथी, घोड़ा, रथ, शेर इनको भी वाहन का स्थान कथाओं में मिला हुआ हैं।

तिरुपति बालाजीने शादी के लिये कुबेरजी से लिया हुआ कर्ज अब तक लौटाया नहीं गया, इस कर्ज की वापसी के लियेही भगवान वेंकटेश बालाजी को धनराशी दान करते हैं। साक्षात त्रिलोकपति भगवान विष्णुजी को कर्ज देनेवाले कुबेरजी, कितने धनवान होंगे यह सोचिये।

विजयादशमी, दशहरे के दिन, आपटा तथा अर्जुन वृक्ष के पत्ते उस दिन सोने के पत्ते माने जाते हैं। भगवान कुबेरजी की आराधना विजयादशमी के दिन विशेष रूप से की जाती हैं। यजुर्वेद में भगवान कुबेरजी को कामवासना का अधिष्ठाता बताया गया हैं। सभी प्रकार की चाहतें, वासनाएँ, कामनाएँ, अभिलाषाएँ पूरी करवानेवाले भगवान वैश्रवण हैं।

मत्स्यपुराण में भगवान कुबेरजी की मूर्ति विवरण से ही दिव्यवस्त्र धारण करनेवाली, शरीर, सुवर्ण कांती से तेजोमय होनेवाली, वज्रधारी और पुष्पक विमान से यात्रा करनेवाले कुबेरजी की धनदाता के रूप में प्रधान स्तुति हैं। विष्णु पुराण में भगवान कुबेरजी के सुवर्णसमान वर्ण का ब्यौरा हैं और पीतवस्त्रधारी, चतुर्भुज कुबेरजी के बायीं ओर पत्नी ऋद्धि विराजित बतायी गई हैं।

॥ ॐ ह्रीं ॐ निंम ह्रीं निंम
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गंगेश्वर ग्रंथ में श्री शंकराचार्य हिरण्यकेशीजी ने कुबेरजी को ‘भगवान कुबेर’ ऐसे स्पष्ट रूप से संबोधित किया हैं। रामायण, महाभारत में महर्षि वाल्मीकि और व्यासमुनि कुबेरजी को धनदेवता एवं धनसंचयता से सम्बंधित करते हुए उनका ‘देवत्व’ अभिनंदित करते हैं।

भगवान कुबेरजी का अन्य नाम ‘कुबेर’ होने के कारण उनके पत्नी को ‘कुबरी’ कहा जाता था। शिव, समुद्री, वार्षी, यक्षी, कुबेरी ऐसे अलग-अलग नामों से कुबेर पत्नी के संदर्भ मिलते हैं। जापान में कुबेरी ‘बिशमोन’ नाम से, गॉड ऑफ वेल्थ संबोधित से जाने जाते हैं।

भगवान कुबेर देव लक्ष्मीता की तरह धर्मसंपन्न तो देते हैं, लेकिन धनसंपन्न की उपलब्धि और समृद्धि भी देते हैं। महालक्ष्मी ये भाग्य की देवता हैं, तो भगवान कुबेर धनदेवता हैं। भगवान कुबेरजी के आशीर्वाद से मात्र हुआ धन, लोगों को भी कल्याणकारी होता हैं, उस धन से प्रगति होती हैं और धन वृद्धि होने लगती, बचत होने लगती हैं।

धन अच्छा या बुरा नहीं होता, तो धनप्राप्ति की चाहत से किया जानेवाला खर्च, अपनी भूमिका या भावना, ये नैतिक-अनैतिक, कानूनी-गैरकानूनी, अच्छी-बुरी होती हैं। इस लिये भगवान कुबेरजी के रूप में आपकी सत-असत विवेकबुद्धि आपका मार्गदर्शन करती हैं। ये अंदर की आवाज सुनना भी भगवान कुबेरजी की उपासना हैं।

श्री शिवजी, श्री गणेश और श्री हनुमान इन जीवनदेवताओं के साथ भगवान कुबेरजी की अनेक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। दिव्य श्री हनुमानी का शारीरिक बल और कुबेरजी का आर्थिक बल जब साथ में हो, तो असंभव क्या हैं?

॥ ॐ निंम श्री वासुपुरुषाय नमः ॥

महाकवि कालिदासजी के महाकाव्य मेघदूत में, कल्पवृक्ष के साथ हुए मद्य का आनंद प्राप्त करवाले, यक्ष-यक्षिणियों का प्रणय और कामक्रीड़ा का विवरण वर्णित हैं। उत्तराखंड में विविध मंदिरों, उत्तराभिमुख कुबेर प्रतिमाओं में सुरापान करवाले कुबेर और सहचर्य यक्षी की प्रतिमाएँ हैं।

भगवान कुबेरजी के संदर्भ में एक विशेषता ये हैं की उत्तर भारत में बालकों के आरोग्य के लिये कुबेर उपासना बड़े पैमाने पर की जाती थी और आज भी की जाती हैं। बालरक्षाकरूप से भगवान कुबेरजी का विधिवत पूजन किया जाता हैं।

हिंदू जिस पूजा में, यज्ञों में, धार्मिक विधियों में, धार्मिक उत्सवों में देश दिशाओं के दिक्पालों का पूजन किया जाता हैं, उन छह में से उत्तर दिशा के अधिपति के नाते, भगवान कुबेरजी का विधिवत पूजन किया जाता हैं। आरती, राजाओं का अभिषेक, अग्निकर्म के अंत में कुबेर मंत्रपुष्पांजलि ही उद्घोषणा की जाती हैं। श्रावण पौर्णिमा कोजागिरी यह भगवान कुबेरजी की जन्मतिथि हैं।

भगवान कुबेरजी मंत्र बुरी नजर, जारण-मारण, अथर्वी शक्तियों के उपद्रव से रक्षा करते हैं। कुंडलिनी शक्ति जागृत करवाले साधक, रुद्राक्ष की कुबेर माला धारण करते हैं। भगवान कुबेरजी की प्रार्थना, आराधना, उपासना नेताओं, अभिनेताओं, अधिकारी, व्यापारियों के विशेष लाभदायक मानी जाती हैं।

कुबेर इस नाम का जो अर्थ निकाला जाता हैं, उसमें ‘कु’ मतलब ‘पृथ्वी’ और ‘वीरा’ मतलब ‘नायक’ अर्थात ‘पृथ्वी का नायक-पृथ्वीपति’ ऐसा कुबेर का मतलब होता हैं। भगवान कुबेरजी को भूत-प्रेत-आत्माओं रखवाले प्रभाव वश ‘भूतेश’ भी कहा जाता हैं। महत्वपूर्ण हैं भगवान कुबेरजी का गौरव, केवल उत्तर दिशा के दिक्पाल ऐसा ही नहीं तो पूरे दुनिया के रक्षक ‘लोकपाल’ ऐसा किया गया हैं।

॥ ॐ ह्रीं ॐ निंम ह्रीं निंम
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कुबेरजी की लंका और स्थानांतरण के बाद अलकापुरी में देवतों, स्वयं शिवजीनी उनके कुबेर प्रेम के खातिर उनके साथ गये थे। पांडवों का जब वनवास हुआ, तब उन्हें सांत्वना हेतु कुबेरजी वन में आने का संदर्भ महाभारत में हैं।

संपत्ति के कारण कुबेरजीपर बार बार संकट आये। आक्रमण हुए। उस हरएक समय, महादेव शंकर उनके रक्षण हेतु आ गये। शुक्राचार्य का आक्रमण शिवजीनेही रोका था। कुबेर सहस्रनाम में भगवान कुबेरजी के सहस्र नाम हैं, लेकिन अलकाधिप, धनाधिप, धनद, यक्षाधिपति, यक्षरक्षक, धनाध्यक्ष, धनेश्वर, राजराज, नरवाहन इत्यादि नाम धर्मग्रंथ में बार बार आते हैं।

गुजरात में बड़ोदरा के नजदीक, नर्मदा के तटपर कुबेर भंडारी मंदिर हैं। २५०० साल पूर्व इस मंदिर में विराजित महादेव ‘कुबेरेश्वर’ के नाम से जाने जाते हैं। नर्मदापरिक्रमा करके यात्री कावींला के कुबेर भंडारी का दर्शन करते हैं।

तांत्रिक, रहस्यमय, गूढ़ विद्याओं में कुबेर यंत्र की रचना यह एक गहन विषय हैं। वेदव्यास तथा रामायण, महाभारत में भी कुबेर यंत्र के संदर्भ आते हैं। आर्थिक समस्याओं का निराकरण करने, विशेष स्थान रखनेवाले भगवान कुबेरजी, अपने भक्त को संकट से बाहर निकालने की उपलब्धि और आर्थिक उन्नति के साधन प्राप्त करा देते हैं, ऐसी लाखों भक्तों की धारणा हैं।

भगवान कुबेरजी की उपासना उधार राशि की वसूली, अटके हुए आर्थिक व्यवहार शुरू करवाने के लिये, जुना कर्ज लौटाने के लिये, नये कर्ज की प्राप्ति के लिये, हितशत्रुओं के कूट कारस्थान को विफल करने के लिये भी की जाती हैं। जीवनभर कुबेर घर में स्थापना अच्छे कर्म करने वाले व्यक्ति को जीते जी ऐश्वर्य प्राप्त होने का साधन माना जाता हैं। अनेक व्यापारी, उद्योगपति और व्यावसायिक भगवान कुबेरजी को अपना भागीदार समझकर अपने मुनाफे का विशिष्ट भाग कुबेर चरणोंमें अर्पण करते हैं।

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